उत्तराखंड में सीएम से लेकर पूर्व मुख्यमंत्रियों तक, कब-कब बदला चुनावी ठिकाना
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक कथित चुनावी सर्वे को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हैं। चर्चा है कि भाजपा करीब 30 मौजूदा विधायकों के टिकट काटने की तैयारी में है। इसी के साथ यह अटकल भी जोर पकड़ रही है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए किसी मुफीद, जिताऊ और अपेक्षाकृत सुरक्षित विधानसभा सीट की तलाश की जा रही है।
सर्वे की पुष्टि भाजपा या संघ की ओर से आधिकारिक तौर पर नहीं हुई है, लेकिन इन चर्चाओं ने विपक्ष को सरकार और भाजपा पर निशाना साधने का मौका जरूर दे दिया है। कांग्रेस कई भाजपा विधायकों के संभावित टिकट कटने और मुख्यमंत्री के लिए सुरक्षित सीट तलाशे जाने को मुद्दा बना रही है। विपक्षी दल यह नैरेटिव बनाने की कोशिश में हैं कि 2027 में भाजपा के सामने बड़ी चुनौती खड़ी है।
हालांकि, उत्तराखंड की सियासत का इतिहास देखें तो मुख्यमंत्री या बड़े नेताओं के लिए मुफीद सीट तलाशने की परंपरा नई नहीं है। राज्य गठन के बाद से ही मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री और दूसरे बड़े नेता समय-समय पर अपनी मूल सीट छोड़कर ऐसी सीटों का रुख करते रहे हैं, जहां उन्हें राजनीतिक रूप से अपेक्षाकृत आसान मुकाबला नजर आया। कई बार यह रणनीति सफल रही तो कई बार मतदाताओं ने तमाम राजनीतिक गणित उलट दिया।
डॉ. नित्यानंद स्वामी: सुरक्षित मानी गई लक्ष्मण चौक सीट भी नहीं बनी मुफीद
उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री डॉ. नित्यानंद स्वामी ने 2002 और 2007 में देहरादून की लक्ष्मण चौक विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। दोनों ही चुनावों में उन्हें कांग्रेस के दिनेश अग्रवाल के हाथों हार का सामना करना पड़ा।
2002 में स्वामी पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से चुनाव मैदान में उतरे थे। इससे पहले 1969 में वह देहरादून विधानसभा से चुनाव लड़ चुके थे। राज्य गठन के बाद परिसीमन और सीटों के पुनर्गठन से लक्ष्मण चौक सीट अस्तित्व में आई और स्वामी ने इसे अपना चुनावी मैदान बनाया। लेकिन राजनीतिक रूप से मुफीद मानी जाने वाली यह सीट उनके लिए जीत का रास्ता नहीं खोल सकी।
भगत सिंह कोश्यारी: कपकोट से लोकसभा तक बदला चुनावी भूगोल
पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने 2002 और 2007 में कपकोट विधानसभा सीट से चुनाव जीता। इसके बाद वह राज्यसभा पहुंचे। 2014 में उन्होंने विधानसभा और राज्यसभा की राजनीति से अलग मैदानी क्षेत्र की नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और लोकसभा पहुंचे।
कोश्यारी का राजनीतिक सफर इस बात का उदाहरण है कि बड़े नेता समय और चुनाव की परिस्थितियों के अनुसार अपने लिए नए राजनीतिक मैदान तलाशते रहे हैं।
एनडी तिवारी: रामनगर में उपचुनाव और 75 प्रतिशत वोट
उत्तराखंड की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने 2002 में विधानसभा की सदस्यता के लिए रामनगर सीट को चुना। इसके लिए तत्कालीन कांग्रेस विधायक योगंबर सिंह रावत ने इस्तीफा दिया था।
दिलचस्प बात यह रही कि नामांकन दाखिल करने के बाद तिवारी ने रामनगर में व्यापक चुनाव प्रचार नहीं किया, फिर भी उन्होंने उपचुनाव में कुल पड़े मतों का करीब 75 प्रतिशत हासिल कर शानदार जीत दर्ज की। उस समय रामनगर को उनके लिए सबसे मुफीद सीटों में माना गया।
बीसी खंडूड़ी: धुमाकोट में रणनीति सफल, कोटद्वार में गणित फेल
2007 में भाजपा की सरकार बनने के बाद जनरल बीसी खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। विधानसभा की सदस्यता हासिल करने के लिए उन्होंने पौड़ी गढ़वाल की धुमाकोट सीट चुनी। कांग्रेस विधायक टीपीएस रावत के इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में खंडूड़ी ने कांग्रेस प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नेगी को हराया।
लेकिन 2012 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री खंडूड़ी ने मैदानी क्षेत्र की कोटद्वार सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया। उनके सामने श्रीनगर और धर्मपुर जैसी सीटों के विकल्प भी बताए जाते थे।
‘खंडूड़ी है जरूरी’ के नारे के बीच भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश किया, लेकिन कोटद्वार में कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी ने उन्हें हरा दिया। भाजपा की सरकार बनाने की संभावनाओं को भी इसका बड़ा नुकसान हुआ और कांग्रेस ने 32 सीटों के साथ सरकार बनाई।
यह चुनाव उत्तराखंड की राजनीति में इस बात का बड़ा उदाहरण बन गया कि जिसे रणनीतिकार सुरक्षित सीट मानते हैं, मतदाता वहां अलग फैसला भी सुना सकते हैं।
रमेश पोखरियाल निशंक: थलीसैंण और कर्णप्रयाग छोड़कर डोईवाला
पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी चुनावी रणनीति के तहत अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन से अलग रास्ता चुना।
निशंक कर्णप्रयाग और थलीसैंण से विधायक रह चुके थे। 2002 में थलीसैंण में उन्हें कांग्रेस के गणेश गोदियाल ने हराया था, जबकि 2007 में निशंक ने इसी सीट से वापसी करते हुए गोदियाल को पराजित किया।
2009 में मुख्यमंत्री बनने के बाद 2012 में विधानसभा चुनाव आया तो निशंक ने थलीसैंण के बजाय डोईवाला सीट से चुनाव लड़ना पसंद किया। उन्होंने कांग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट को 1,272 मतों से हराया।
2014 में हरिद्वार लोकसभा सीट से सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने डोईवाला विधानसभा सीट छोड़ दी।
विजय बहुगुणा: गढ़वाल से कुमाऊं की सितारगंज सीट तक
2012 में मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा का फैसला भी बेहद चर्चित रहा। टिहरी लोकसभा से सांसद रह चुके बहुगुणा ने विधानसभा की सदस्यता के लिए गढ़वाल की सीट चुनने के बजाय कुमाऊं की सितारगंज विधानसभा सीट का रुख किया।
सितारगंज से भाजपा विधायक किरण चंद्र मंडल ने विधायक पद से इस्तीफा देकर कांग्रेस का दामन थामा। इसके बाद बहुगुणा ने उपचुनाव लड़ा और भाजपा के प्रकाश पंत को हराया।
आज इसी राजनीतिक घटनाक्रम की एक दिलचस्प कड़ी यह है कि सितारगंज से किरण चंद्र मंडल के बेटे सौरभ बहुगुणा 2017 और 2022 में भाजपा के टिकट पर विधायक चुने जा चुके हैं।
हरीश रावत: धारचूला में जीत से लेकर दो सीटों पर हार तक
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का चुनावी सफर भी सीट बदलने की राजनीति का बड़ा उदाहरण है।
लोकसभा में पिथौरागढ़-अल्मोड़ा से तीन बार सांसद रहे रावत बाद में हरिद्वार की राजनीति में गए और 2009 में हरिद्वार लोकसभा सीट से चुनाव जीते। 2014 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें विधानसभा की सदस्यता हासिल करनी थी। इसके लिए उन्होंने धारचूला सीट चुनी। कांग्रेस विधायक हरीश धामी के इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में रावत ने जीत दर्ज की।
लेकिन 2017 में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पहाड़ के बजाय मैदानी सीटों को सुरक्षित मानकर चुनाव लड़ने की रणनीति अपनाई। उन्होंने हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों सीटों पर हार गए।
2022 में भी रावत के चुनावी मैदान को लेकर काफी खींचतान रही। पहले रामनगर से चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन अंतिम समय में उन्हें लालकुआं से टिकट मिला। वहां भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने उन्हें बड़े अंतर से हरा दिया।
हरीश रावत का चुनावी सफर यह बताता है कि सुरक्षित मानी गई सीट का राजनीतिक आकलन हमेशा सही साबित हो, यह जरूरी नहीं।
तीरथ सिंह रावत: पौड़ी से चौबट्टाखाल और फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी
तीरथ सिंह रावत 2002 और 2007 में पौड़ी विधानसभा सीट से चुनाव लड़े, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बाद में पौड़ी सीट के आरक्षित होने के कारण उन्होंने चौबट्टाखाल का रुख किया।
2012 में उन्होंने चौबट्टाखाल से विधानसभा चुनाव जीता। 2019 में पौड़ी लोकसभा सीट से सांसद चुने गए और 2021 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने।
मुख्यमंत्री बनने के बाद छह महीने के भीतर विधानसभा सदस्य बनने की संवैधानिक बाध्यता थी। उस समय उनके लिए विधानसभा सीट को लेकर कई राजनीतिक समीकरण बने, लेकिन उपचुनाव का रास्ता साफ नहीं हो सका। अंततः उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और इसके बाद पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री बने।
पुष्कर सिंह धामी: खटीमा की हार के बाद चंपावत से रिकॉर्ड जीत
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मामले में सुरक्षित सीट की चर्चा सबसे ज्यादा इसलिए होती है क्योंकि 2022 में मुख्यमंत्री रहते हुए वह अपनी परंपरागत खटीमा विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे।
धामी 2012 और 2017 में खटीमा से भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे। लेकिन 2022 में कांग्रेस प्रत्याशी भुवन चंद्र कापड़ी ने उन्हें पराजित कर दिया।
इसके बावजूद भाजपा नेतृत्व ने धामी को मुख्यमंत्री बनाए रखा। विधानसभा की सदस्यता के लिए चंपावत के भाजपा विधायक कैलाश गहतोड़ी ने इस्तीफा दिया और जून 2022 में हुए उपचुनाव में धामी ने कांग्रेस प्रत्याशी को बड़े अंतर से हराकर विधानसभा में प्रवेश किया।
अब 2027 को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि धामी खटीमा से चुनाव लड़ेंगे, चंपावत से मैदान में उतरेंगे या भाजपा उनके लिए कोई दूसरी राजनीतिक रूप से मुफीद सीट तलाशेगी।
चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ने के लिए निमंत्रण मिल रहा है। हालांकि, अंतिम फैसला भाजपा संगठन और खुद मुख्यमंत्री को करना है।
ऋतु खंडूड़ी, किशोर उपाध्याय और हरक सिंह रावत भी बदलते रहे चुनावी ठिकाने
उत्तराखंड की राजनीति में सीट बदलने की कहानी सिर्फ मुख्यमंत्रियों तक सीमित नहीं है।
हरक सिंह रावत पौड़ी, लैंसडौन, रुद्रप्रयाग और कोटद्वार जैसी अलग-अलग सीटों से चुनाव जीत चुके हैं। अब 2027 में उनके सहसपुर से चुनाव लड़ने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं, हालांकि अंतिम तस्वीर स्पष्ट नहीं है।
किशोर उपाध्याय ने भी अपनी पारंपरिक टिहरी सीट से अलग हटकर 2017 में सहसपुर से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 2022 में वह वापस टिहरी पहुंचे और भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत गए।
इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी की बेटी ऋतु खंडूड़ी ने यमकेश्वर के बाद 2022 में कोटद्वार का रुख किया और वहां से चुनाव जीता।
सवाल सिर्फ भाजपा पर क्यों?
यही वह बिंदु है जहां 2027 के चुनाव से पहले शुरू हुई मौजूदा बहस दिलचस्प हो जाती है।
यदि भाजपा के किसी नेता या मुख्यमंत्री के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित विधानसभा सीट तलाशने की कवायद हो रही है, तो इसे असाधारण राजनीतिक घटना बताना इतिहास के संदर्भ में अधूरा होगा। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री और बड़े नेताओं ने समय-समय पर अपनी राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से सीट बदली है।
कहीं मौजूदा विधायक ने मुख्यमंत्री के लिए सीट खाली की, कहीं परिसीमन ने चुनावी समीकरण बदल दिए, तो कहीं नेताओं ने खुद पहाड़ से मैदान या एक जिले से दूसरे जिले का रुख किया।
और हर बार नतीजा एक जैसा नहीं रहा। एनडी तिवारी और विजय बहुगुणा जैसे नेताओं के लिए सीट बदलना सफल रहा, जबकि बीसी खंडूड़ी और हरीश रावत जैसे दिग्गजों को ‘सुरक्षित’ मानी गई सीट पर भी मतदाताओं ने शिकस्त दे दी। पुष्कर सिंह धामी के मामले में भी 2022 का खटीमा चुनाव और उसके बाद चंपावत उपचुनाव दो बिल्कुल अलग तस्वीरें पेश करते हैं।
2027 में फिर होगी ‘सुरक्षित सीट’ की सियासत
इसलिए 2027 के चुनाव से पहले यदि मुख्यमंत्री धामी के लिए किसी मुफीद सीट की तलाश की जा रही है तो इसे सिर्फ भाजपा की कमजोरी के रूप में देखना उत्तराखंड की चुनावी राजनीति की पुरानी परंपरा को नजरअंदाज करना होगा।
असल सवाल यह होगा कि भाजपा अंततः धामी को कहां से मैदान में उतारती है, किन मौजूदा विधायकों के टिकट काटती है और उसके कथित सर्वे का वास्तविक चुनावी टिकट वितरण से कितना संबंध निकलता है।
कांग्रेस और विपक्ष के लिए यह मुद्दा स्वाभाविक तौर पर राजनीतिक हथियार है। भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह इन चर्चाओं को चुनावी नैरेटिव बनने से कैसे रोकती है।
क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास एक बात साफ करता है—सुरक्षित सीट का राजनीतिक गणित कागज पर जितना आसान दिखाई देता है, मतदान की तारीख आते-आते उतना ही पेचीदा हो सकता है।
और शायद यही वजह है कि 2027 के चुनाव से पहले सवाल यह नहीं है कि नेता सुरक्षित सीट क्यों तलाश रहे हैं; असली सवाल यह है कि जिसे नेता सुरक्षित समझ रहा है, क्या वहां का मतदाता भी उसे सुरक्षित मानता है?